18 December 2017, Mon

सारे राजा कतार में तब जयपुर का गौरव रहा कायम

Created at April 16, 2015

सारे राजा कतार में तब जयपुर का गौरव रहा कायम
Updated at April 16, 2015
 

जयपुर शहर की शान मानी जाने वाली इमारतों में से एक अल्बर्ट हॉल के बारे में तो अधिकांश लोगों को ज्ञात है कि इसे महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय ने ब्रिटिश साम्राज्य के उत्तराधिकारी प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन पर बनवाया था। पर बहुत कम लोग शायद इस बात को भी जानते होंगे कि अल्बर्ट के भारत आगमन के साथ ही उन्हें तमाम देशी रियासतों में जयपुर के अलहदा होने का अहसास भारत की धरती पर कदम रखते ही हो गया था।  1875 में भारत आए अल्बर्ट का दौरा हिन्दुस्तान की तमाम रियासतों के लिए बहुत अहमियत रखता था। सभी को इस बात का अहसास था रानी विक्टोरिया के सबसे बड़े पुत्र  5अल्बर्ट एडवर्ड ही ब्रिटेन के भावी सम्राट हैं, और उनकी कृपा दृष्टि उनके वारे न्यारे कर सकती है। कोप भाजन होने पर ब्रिटिश हूकूमत क्या कर सकती है यह सभी देशी रियासतें देख ही चुकी थीं।
11 अक्टूबर 1875 को लंदन से शाही पोत एचएमएसएस सेरामिस में पचास सदस्यीय दल को लेकर रवाना हुआ जो पहले बोम्बे और फिर सिलोन (अब श्रीलंका) होते हुए दिसम्बर में कोलकाता पहुंचा। जयपुर में उनके स्वागत के लिए तमाम तैयारियां हुईं जिनमें शहर की रंगाई पुताई हुईं और शहर ने गुलाबी रंग का बाना पहना। इसी वजह से शहर का नाम गुलाबी नगर भी पड़ा। इसे गुलाबी ही क्यों रंगा इसकी चर्चा आगे करेंगे। अभी तो कोलकाता में प्रिंस अलबर्ट से सवाई रामसिंह की पहली मुलाकात  का हाल ही देखते हैं जिसने उस रियासती दौर में जयपुर को अलग ही गौरव दिया।
ठाकुर फतेह सिंह चंपावत ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ जयपुर में लिखते हैं कि प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर सभी राजा महाराजाओं को अंग्रेजी हुकुमत ने कोलकाता बुलाया था। जिस पर सवाई रामसिंह भी कोलकाता पहुंचे। सभी महाराजाओं के रहने के इंतजाम समुद्र तट पर ही किए गए थे। 23 दिसम्बर 1875 को प्रिंस का जहाज कोलकाता पहुंचा। शाम करीब चार बजे सभी राजा महाराजा अधिकारी जहाज के एक दम सामने समुद्र तट पर उनकी अगवानी के लिए मौजूद थे। सभी के बैठने के लिए कुर्सियां चंद्राकार घेरे में लगाई गईं। सभी को अपने साथ एक एक मातहत ले जाने की इजाजत मिली थी। जैसे ही जहाज ने लंगर डाला वायसराय लॉर्ड नार्थ ब्रुक सबसे पहले जहाज पर पहुंचे और प्रिंस का स्वागत किया। राजाओं को दोनों तरफ कतार में खड़े होने के लिए कहा गया। सवाई रामसिंह ने जब देखा कि दायीं तरफ की पंक्ति के पहले स्थान पर ग्वालियर के महाराजा ने कब्जा कर लिया है और बायीं तरफ की पंक्ति की पहली जगह पर कश्मीर के राजा खड़े हो गए हैं तो उन्होंने दूसरे स्थान पर कतार में खड़ा होना उपयुक्त नहीं समझा। वे अपनी ही कुर्सी पर ही शान्ति के साथ बैठे रहे। पॉलिटिकल एजेेंट ने महाराजा को कतार में अन्य राजाओं के साथ खड़े होने के लिए कहा भी, पर महाराजा ने जवाब दिया कि हमें उम्मीद थी कि हमें यहां प्रिंस का व्यक्तिगत रूप से स्वागत करना है न कि एक दरबारी के रूप में जैसा कि यहां प्रतीत हो रहा है्र और महाराजा अपनी जगह से नहीं हिले। इस बीच प्रिंस अल्बर्ट जहाज से उतर कर समुद्र तट पर पहुंच चुके थे और दोनों तरफ कतार बद्ध राजाओं से हाथ मिलाते हुए आगे बढ़ रहे थे। सबसे हाथ मिलाने के बाद प्रिंस स्वयं उस तरफ बढ़ कर आए जहां सवाई रामसिंह अपनी कुर्सी पर बैठे थे। वायसराय नॉर्थ ब्रुक ने महाराजा का परिचय प्रिंस से करवाया तब रामसिंह अपनी जगह से खड़े हुए और प्रिंस अल्बर्ट से हाथ मिलाया। इसके बाद प्रिंस अपने तय निवास की ओर चले गए। पर इस घटना ने महाराजा की छवि देश के अन्य सभी राजाओं से अलग स्थापित कर दी। जहां अन्य राजाओं ने कतारबद्ध हो अपने आपको ब्रिटिश सत्ता के आगे नतमस्तक कर दिया था वहीं सवाई रामसिंह ने अपनी संप्रुभता को बरकरार रखते हुए प्रिंस का स्वागत किया था। इसके बाद प्रिंस ने महाराजा से मुलाकात में उन्हें तलवार भी भेंट की।