18 December 2017, Mon

नागाओं के जौहर और मशाल जुलूस से चमत्कृत अल्बर्ट

Created at April 30, 2015

नागाओं के जौहर और मशाल जुलूस से चमत्कृत अल्बर्ट
Updated at April 30, 2015
 

प्रिंस अल्बर्ट के भारत आगमन के दौरान कोलकाता में सवाई रामसिंह से पहली मुलाकात के बारे में हम पिछली बार बात कर चुके हैं। आज बात प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन की। जयपुर को नए सिरे से सजाया गया। सभी बाजारों और इमारतों को ठीक तरह से मरम्मत के आदेश जारी हुए और थोड़े ही समय में जयपुर गुलाबी नगर बन कर प्रिंस के स्वागत के लिए तैयार हो गया। शाही मेहमान के रहने के लिए रेजीडेंसी बंग्लो (वर्तमान में राजमहल पैलेस) को चुना गया। पर इसे अपर्याप्त मानते हुए इसके सामने के मैदान में शाही टेन्ट गाड़े गए। सभी जागीरदारों को अपनी सेनाओं को लवाजमे से सजाने के आदेश दिए गए। इससे पहले हाथियों पर हौदे बांधने की परम्परा नहीं थी, शाही काफिले के लिए 60 ने हौदे तैयार करवाए गए। ४ फरवरी 1876 को प्रिंस एडवर्ड अल्बर्ट आगरा से जयपुर के लिए राजपूताना स्टेट रेलवे की शाही रेल से सुबह पौने नौ बजे  रवाना हुए। प्रिंस अल्बर्ट के निजी सचिव विलियम होवर्ड रसैल की लिखी प्रिंस ऑफ वेल्स, ए टूर ऑफ इंडिया-ए डायरी इन इंडिया और ठाकुर फतेहसिंह चंपावत की ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ जयपुर के अनुसार प्रिंस रास्ते में भरतपुर में करीब एक घंटे रुके। पुराने किले से बंदूकों की गर्जना ने प्रिंस का स्वागत किया और प्रिंस सहित सभी मेहमानों ने भरतपुर महल में दोपहर भोज किया। इसके बाद भरतपुर महाराज उन्हें स्टेशन तक छोडऩे आए और ट्रेन जयपुर के लिए रवाना हुई। ट्रेन यात्रा के चलते यह तय किया गया कि सवाई रामसिंह स्वागत के लिए सीमा पर नहीं जाएंगे। जयपुर का शाही पचरंगा निशान सीमा पर एक पहाड़ी पर फहराया गया। जैसे ही ट्रेन ने वहां से रियासत में प्रवेश किया बंदूकों से हवाई फायर कर सलामी दी गई। इसके बाद ट्रेन जिस भी किले, गढ़, गढ़ी के पास से गुजरी सब जगह से सलामियां दागी गईं। पूरे रास्ते भर हर मील के दूरी पर सैनिक तैनात किए गए थे ताकि ट्रेन की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित की जा सके। जयपुर स्टेशन को दोपहर दो बजे से पहले ही सजा दिया गया था और कालीन बिछा दिया गया था। रेलवे स्टेशन से सांगानेरी गेट और फिर दोनों चौपड़ों से होते हुए अजमेरी गेट तक रियासती सेना के पैदल और घुड़सवार दस्तों को कतारबद्ध खड़ा किया गया। रेजीडेंसी के रास्ते में भी घुड़सवार दस्तों का इंतजाम किया गया था। रेलवे स्टेशन, सांगानेरी गेट और रेजीडेंसी में बंदूकों की सलामी का इंतजाम किया गया था। महाराजा, पॉलिटिकल एजेंट कर्नल जैकब व अन्य सामंत और यूरोपीय अधिकारी साढ़े तीन बजे स्टेशन पहुंच गए थे। और ठीक चार बजे प्रिंस की ट्रेन जयपुर स्टेशन पर पहुंची। महाराजा ने आगे बढ़ कर प्रिंस का हाथ मिला कर स्वागत किया। फिर यूरोपियन अधिकारियों ने और फिर सामंतों ने।  प्रिंस के स्टेशन से उतरते ही स्टेशन पर बंदूकों से सलामी दी गई और किलों से भी सलामी दी गई। महाराजा और प्रिंस एक दूसरे का हाथ थामे हुए स्टेशन से बाहर आए चार घोड़ों की बग्घी में सवार हुए। प्रिंस महाराजा के दायीं तरफ बैठे। शाही काफिला स्टेशन से सांगानेरी गेट पहुंचा। इस दौरान लगातार उन्हें सलामियां दी जाती रहीं। सांगानेरी गेट से शाही काफिला हाथियों पर सवार हुआ। अल्बर्ट सोने और चांदी हौदे में महाराजा के दांयी और बैठे। उनके पीछे एक यूरोपियन हाथ में चंवर लिए बैठा। शाही हाथी के दोनों और दो राजपूत सरदार सुनहरा मोरछाल ले कर बैठे। इनके पीछे हाथियों की दो कतार लगीं। जिनमें दांयी कतार में यूरोपियन और बांयी कतार में रियासती सामंत बैठे। काफिले के आगे नागा तलवारबाजी के जौहर दिखाते हुए चल रहे थे। नागाओं से पहले रियासत के सजे धजे घोड़े और मधुर स्वर लहरियां बिखरते बैंड चल रहे थे। रास्ते के दोनों तरफ बड़ी संख्या में लोग खड़े थे। रसेल लिखते हैं कि हम एक दरवाजे से शहर में घुसे और जो जयपुर हमने उस काफिले में शरीक हो कर देखा वह हमारे लिए हमेशा एक आश्चर्य की तरह बना रहेगा। अंधेरा गहराने के साथ ही काफिले में दोनों ओर मशालें जलाईं गईं। भारी भीड़ के चलते काफिले के आगे बढऩे की गति बहुत धीमे थी। शाही काफिला सांगानेरी गेट से चौपड़ त्रिपोलिया होते हुए अजमेरी गेट और फिर रेजीडेंसी पहुंचा।