18 December 2017, Mon

ओ सजना बरखा बहार आई, रस की फुहार लाई

Created at March 12, 2016

ओ सजना बरखा बहार आई, रस की फुहार लाई
Updated at March 12, 2016
 

कुछ महीने पहले मशहूर तारिका साधना इस दुनिया से रुखसत हो गईं। पर्दे पर अभिनीत अपने तमाम यादगार किरदारों के साथ वो छोड़ गई कुछ सदाबहार गीत, जिन्हें गुनगुनाते वक्त उनका सलोना चेहरा बरबस सामने आ जाता है। ऐसे ही एक गीत था फिल्म परख का जिसे लता मंगेशकर ने आपनी आवाज से संवारा था।
जिस साल फिल्म परख रिलीज हुई उसी साल साधना की फिल्म लव इन शिमला भी रिलीज हुई। इसी फिल्म में निर्देशक आरके नैयर ने साधना की चौड़ी पेशानी छिपाने के लिए साधना कट की शुरुआत की। पर जब इसी रूप में साधना विमल राय के पास परख फिल्म के लिए रोल मांगने गईं तो एक बड़ा मजेदार वाकया हुआ।
जब साधना इसी हेयर स्टाइल के साथ फिल्म परख के शूट पर पहुंची तो बिमल दा काफी खफा हो गए। गांव की गोरी ऐसी ग्लैमरस लड़की कैसे हो सकती थी। मौके की नजाकत को भांपकर साधना ने मेकअप रूम में जाकर बालों को फिर से संवारा और सीधी मांग निकालकर दादा के सामने हाजिर हो गई। दादा ने एहतियातन एक और टेस्ट लिया। टेस्ट से खुश दादा ने मुस्कराकर साधना से कहा ओके। इसके बाद जिस समर्पण भाव के साथ साधना ने बिमल दा के साथ काम किया वे उससे इतने मुत्तासिर हुए कि उन्हें साधना में महान अभिनेत्री नूतन के गुण दिखाए देने लगे।
तो ये थी साधना की इस फिल्म के लिए सादगी से भरे सौंदर्य की प्रतिमूर्ति वाली छवि की कहानी। इस फिल्म को देखने वाले जब भी इस गीत की बात करते हैं उनके मन में साधना की ये प्यारी छवि भी जरूर उभरती है। लता जी के गाए गीत को सुनने के बाद बस दिल में एक भावना रह जाती है…कुछ अद्भुत सा महसूस कर लेने की। गीतकार शैलेंद्र के शब्द बारिश की रूमानियत में विकल होती तरुणी के मन को बड़ी खूबसूरती से पढ़ते हैं। वैसे भी बारिश की फुहारें जब हमारे आसपास की प्रकृति को अपने स्वच्छ जल से धो कर हरा भरा करने लगती हैं तो उन्हें देख कर हरे भरे पेड़ों की तरह अपनी ही मस्ती में किसी का दिल भी झूमने लगे तो उसमें उसका क्या दोष। और फिर, ये हृदय तो एक विरहणी का है तो वो तो जलेगा ही…। साजन के प्रेम को आतुर अंखिया तो तरसेंगी ही…।
ओ सजना बरखा बहार आई
रस की फुहार लाई
रस की फुहार लाई, अंखियों मे प्यार लाई
ओ सजना बरखा बहार आई
रस की फुहार लाई, अंखियों मे प्यार लाई
ओ सजना…
तुमको पुकारे मेरे मन का पपिहरा
तुमको पुकारे मेरे मन का पपिहरा
मीठी मीठी अगनी में, जले मोरा जियरा
ओ सजना…
ऐसी रिमझिम में ओ सजन, प्यासे प्यासे मेरे नयन
तेरे ही, ख्वाब में, खो गए…
ऐसी रिमझिम में ओ सजन, प्यासे प्यासे मेरे नयन
तेरे ही, ख्वाब में, खो गए
सांवली सलोनी घटा, जब जब छाई
सांवली सलोनी घटा, जब जब छाई
अंखियों में रैना गई, निंदिया न आई
ओ सजना…
इस गीत के संगीतकार थे सलिल चौधरी। पुराने दौर के गीतों का भी अपना अंदाज था। इसी गीत को लें। गीत की शुरुआत पे गौर करें बारिश की बूंदों के साथ कीटों पतंगों का शोर सिर्फ  चार सैकंड तक ही बजता है पर तब तक आपका मन वर्षामय हो चुका होता है। और फिर सितार की धुन एकदम से आ जाती है। एक बार लता जी का दिव्य स्वर कानों में पड़ता है तो मन गीत के बोलों में रमने लगता है कि तबले की थाप और अंत में आता पश्चिमी शास्त्रीय अंदाज लिए कोरस बिल्कुल गौण हो जाते हैं। सलिल दा ने लता जी को जिस अंदाज में ऐसी रिमझिम में ओ सजन, प्यासे प्यासे मेरे नयन, तेरे ही, ख्वाब में, खो गए गवाया है वो गाने की खूबसूरती को और बढ़ा देता है।
(लेखक सेल में अधिकारी व
ब्लॉग पर संगीत समीक्षा- यात्रा
लेखन में सक्रिय हैं)