18 December 2017, Mon

तुझे याद कर लिया है, आयत की तरह...

Created at March 19, 2016

तुझे याद कर लिया है, आयत की तरह…
Updated at March 19, 2016
 

आज बात करेंगे  बाजीराव मस्तानी के उस नग्मे की जिस पर आपका ध्यान फिल्म देखते हुए शायद ही गया हो। गीत के बोल थे तुझे याद कर लिया है आयत की तरह कायम तू हो गई है रिवायत की तरह। अब इस आयत को क्षेत्रमिति वाला आयत (रेक्टएंगल) मत समझ लीजिएगा। दरअसल कुरान में लिखी बात को भी आयत कहते हैं। तो किसी को…याद करने की सोच को आयत का बिम्ब देना अपने आप कमाल है न और ये कमाल दिखाया एक किसान के बेटे ने। जी हां इस गीत को लिखने वाले हैं एएम तुराज जो कि मुजफ्फरनगर के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। अब तुराज साहब के बारे में क्या कहें।
तीन पीढिय़ों तक उन्होंने घर में किसानी का काम होते ही देखा। खुद तो हिंदी मीडियम से पढ़े पर पिता के शायरी के शौक ने उन्हें उर्दू भी सिखा दी। पहली बार कविता तो उन्होंने 18 साल का होने के बाद लिखी पर इससे पहले ये समझ गए कि उनसे खेती बारी नहीं होने वाली। पिता तो इस आशा में थे कि वो भी उनके साथ काम करें पर उन्होंने मुंबई जा कर काम करने की इच्छा जताई। पिता की अनुमति तो नहीं मिली पर दादी अपने लाड़ले पोते के बचाव में आ गई और उन्होंने उनके वालिद से कह दिया कि आप भेज रहे हैं या हम भेंजें। फिर क्या था पिताजी को झुकना पड़ा  और बीस साल से भी कम उम्र में तुराज मुंबई आ गए।
अरिजीत सिंह व  एएम तुराज एक दो साल इधर उधर की खाक छानने के बाद टीवी सीरियल के लिए गीत व संवाद लिखने का काम मिलने लगा। वर्ष 2005 बतौर गीतकार उन्होंने  इस्माइल दरबार के साथ अपनी पहली फिल्म की। इस्माइल दरबार ने ही उन्हें संजय लीला भंसाली से मिलवाया जब वे सांवरिया बना रहे थे। तुराज को सांवरिया में तो काम नहीं मिला पर गुजारिश के लिए संजय ने उन्हें फिर बुलाया। तुराज उस मुलाकात को याद कर कहते हैं कि संजय सर ने मुझसे  यही कहा कि धुन, संगीत सब भूल जाओ बस कविता के लिहाज से तुमने  जो सबसे अच्छा मुखड़ा लिखा हो वो मुझे दो। मैंने उन्हें ये तेरा जिक्र है या इत्र है…।  सुनाया और उन्होंने इसे  फिल्म के लिए चुन लिया जबकि यही मुखड़ा मैं बहुत लोगों को पहले भी सुना चुका था पर किसी की समझ में नहीं आया। मैं वो लिखना चाहता हूं, जिसे मुझे और सुनने वाले की रुह को सुकून मिले और संजय लीला भंसाली ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने ऐसा करने का मुझे अवसर दिया।
जिंदगी में जब दूरियां बढ़ती हैं तो यादें काम आती हैं। अपने प्रिय के साथ बिताया एक-एक पल हमारे जेहन में मोतियों की तरह चमकता है। उस चमक को हम अपने दिल में यूं संजो लेते है कि उन क्षणों के बारे में बार-बार सोचना व महसूस करना हमारी आदत में शुमार हो जाता है। तुराज इन्हीं भावों से मुखड़े की शुरुआत करते हैं। पर मुखड़े के पहले ताल वाद्य की हल्की-हल्की थाप के बीच अरिजीत सिंह का शास्त्रीय आलाप शुरू होता है, जिसे सुन मन इस संजीदगी भरे गीत के रंग में रंग जाता है।
संजय लीला भंसाली का शुरुआती संगीत संयोजन और अरिजीत का आलाप मुझे रामलीला के उनके गीत लाल इश्क की याद दिला देता है। हम दिल दे चुके सनम के बाद से उन्होंने इस्माइल दरबार को बतौर संगीतकार काम नहीं करवाया हो पर अपने अभिन्न मित्र के संगीत की छाप उनके बाद की फिल्मों में भी दिखी है पर इसके बावज़ूद भी गर उनके गीत मुझे इतने मधुर लगे हैं तो इसकी वजह है गीतकार व गायकों का उनका उचित चुनाव। अरिजीत सिंह ने इस गीत के बोलों को अपनी रूह से महसूस करते हुए गाया है। उन्हें भले ही इस साल का फिल्मफेयर अवार्ड सूरज डूबा है के लिए मिला पर इस गीत के लिए वो उस इनाम के ज्यादा हकदार थे। मुखड़े के बीच की कव्वाली के टुकड़े में उनका साथ दिया है अजीज नाजा और शाहदाब फरीदी ने।
तुझे याद कर लिया है,
तुझे याद कर लिया है,
आयत की तरह
कायम तू हो गई है
़कायम तू हो गई है
रिवायत की तरह
तुझे याद कर लिया है
मरने तलक रहेगी
मरने तलक रहेगी
तू आदत की तरह
तुझे…की तरह
ये तेरी और मेरी मोहब्बत हयात है
हर लम्हा इसमें जीना मुकद्दर की बात है
कहती है इश्क दुनिया जिसे मेरी  जान-ए-मन
इस एक लफ्ज में ही छिपी कायनात है…
मेरे दिल की राहतों का तू जरिया  बन  गई है
तेरी इश्क की मेरे दिल में कई ईद मन गई  है
तेरा जिक्र हो रहा है, तेरा जिक्र हो रहा है, इबादत  की  तरह
तुझे…की तरह
(लेखक सेल में अधिकारी व
ब्लॉग पर संगीत समीक्षा- यात्रा लेखन में सक्रिय हैं) manish_kmr1111@yahoo.com