18 December 2017, Mon

आजा पिया, तोहे प्यार दूं, गोरी बैयां, तोपे वार दूं...

Created at April 9, 2016

आजा पिया, तोहे प्यार दूं, गोरी बैयां, तोपे वार दूं…
Updated at April 9, 2016
 

साठ के दशक में नासिर हुसैन साहब ने एक फिल्म बनाई थी बहारों के सपने। फिल्म का संगीत तो बहुत लोकप्रिय हुआ था पर अपनी लचर पटकथा के कारण फिल्म बॉक्स आफिस पर ढेर हो गई थी। कल बहुत दिनों बाद इस फिल्म के अपने प्रिय गीत को सुनने का अवसर मिला तो सोचा आज इसी गीत पर आपसे दो बातें कर ली जाएं। लता की मीठी आवाज और मजरूह के लिखे बोलों पर पंचम की संगीतबद्ध इस मधुर रचना को सुनते ही मेरा इसे गुनगुनाने का दिल करने लगता है। मजरूह साहब ने इतने सहज पर इतने प्यारे बोल लिखे इस गीत के कि क्या कहा जाए। पर पहले बात संगीतकार  पंचम की। 1967 में जब ये फिल्म प्रदर्शित हुई थी तो पंचम तीसरी मंजिल की सफलता के बाद धीरे-धीरे हिंदी फिल्म संगीत में अपनी पकड़ जमा रहे थे। पर शुरू से ही उनकी छवि पश्चिमी साजों के साथ तरह तरह की आवाजों को मिश्रित कर एक नई शैली विकसित करने वाले संगीतकार की बन गई थी। पर उन्होंने अपनी इस छवि से हटकर जब भी शास्त्रीय या विशुद्ध मेलोडी प्रधान गीतों की रचना की, परिणाम शानदार ही रहे। आजा पिया, तोहे प्यार दूं…, का शुमार पंचम के ऐसे ही गीतों में किया जाता रहा है।
वैसे क्या आपको मालूम है कि इस गीत की धुन इस फिल्म को सोचकर नहीं बनाई गई थी। सबसे पहले इस धुन का इस्तेमाल फिल्म तीन देवियां के पाश्र्व संगीत में हुआ था। सचिन देव बर्मन उस फिल्म के संगीतकार थे पर संगीत के जानकारों का मानना है कि उसका पाश्र्व संगीत यानि बैकग्राउंड स्कोर पंचम की ही देन थी। हां, ये बात जरूर थी कि मजरूह सुल्तानपुरी दोनों फिल्मों के गीतकार थे। हो सकता है मजरूह ने ये गीत तभी लिखा हो और उस फिल्म में न प्रयुक्त हो पाने की वजह से उसका इस्तेमाल यहां हुआ हो या फिर उस शुरुआती धुन को पंचम ने इस फिल्म के लिए विकसित किया हो। खैर जो भी हो पंचम को इस बात की शाबासी देनी चाहिए कि उन्होंने मधुर लय में बहते गीत के संगीत संयोजन में लता की आवाज को सर्वोपरि रखा। इंटरल्यूड्स में एक जगह संतूर के टुकड़े के साथ बांसुरी आई तो दूसरी जगह सेक्सो।
गीतकार मजरूह के कम्युनिस्ट अतीत, गीत लिखने के प्रति उनकी शुरुआती अनिच्छा और प्रगतिशील गजल लिखने वालों में फैज के समकक्ष न पहुंच पाने के मलाल की बातें तो यहां मैंने पहले भी रखी हैं। आज आपके सामने उनका परिचय उनके समकालीन शायर निदा फाजली के माध्यम से कराना चाहता हूं। निदा फाजली ने अपने एक संस्मरण में मजरूह की छवि को बढ़ी खूबसूरती से कुछ यूं गढ़ा है- शक्लो सूरत से काबीले दीदार, तरन्नुम से श्रोताओं के दिलदार, बुढ़ापे तक चेहरे की जगमगाहट, पान से लाल होठों की मुस्कुराहट और अपने आंखों की गुनगुनाहट से मजरूह दूर से ही पहचाने जाते थे। बंबई आने से पहले यूपी के छोटे से इलाके में एक छोटा सा यूनानी दवाखाना चलाते थे। एक स्थानीय मुशायरे में जिगर साहब ने उन्हें सुना और अपने साथ मुंबई के एक बड़े मुशायरे में ले आए। सुंदर आवाज, गजल में उम्र के लिहाज से जवान अल्फाज, बदन पर सजी लखनवी शेरवानी के अंदाज ने स्टेज पर जो जादू जगाया कि पर्दा नशीनों ने नकाबों को उठा दिया। मजरूह ने जहां अपनी शायरी में अरबी फारसी के शब्दों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया वहीं गीतों में यूपी की बोली का। नतीजा ये रहा कि उनकी गजलों की अपेक्षा गीतों को आम जनता ने हाथों हाथ लिया। अब इस गीत को ही लें, एक प्रेम से भरी नारी की भावनाओं को कितनी सहजता से व्यक्त किया था मजरूह ने। दुख के बदले सुख लेने की बात तो खैर अपनी जगह थी पर उसके साथ मैं भी जीयूं, तू भी जिए लिखकर मजरूह ने उस भाव को कितना गहरा बना दिया। तीनों अंतरों में मजरूह की बातें लता जी की आवाज में कानों में वो रस बरसाती हैं कि बस मन किसी पर न्योछावर कर देने को जी चाहने लगता है…।
आजा पिया, तोहे प्यार दूं
गोरी बैयां, तोपे वार दूं
किसलिए तू, इतना उदास?
सूखे सूखे होंठ, अखियों में प्यास
किसलिए, किसलिए?
जल चुके हैं बदन कई, पिया इसी रात में, थके हुए इन हाथों को, दे दे मेरे हाथ में
हो सुख मेरा ले ले, मैं दु:ख तेरे ले लूं, मैं भी जीयूं, तू भी जिए
होने दे रे, जो ये जुल्मी हैं, पथ तेरे गांव के, पलकों से चुन डालूंगी मैं, कांटे तेरे पांव के
हो लट बिखराए, चुनरिया बिछाए
बैठी हूं मैं, तेरे लिए, अपनी तो, जब अखियों से, बह चली धार सी
खिल पड़ीं, वहीं इक हंसी, पिया तेरे प्यार की, हो मैं जो नहीं हारी, सजन जरा सोचो
किसलिए, किसलिए?                                                                       - मनीष कुमार
(लेखक सेल में अधिकारी व ब्लॉग पर संगीत समीक्षा- यात्रा लेखन में सक्रिय हैं)  manish_kmr1111@yahoo.com