18 December 2017, Mon

परदेस में जन्मभूमि, उठती हैं मन में यादें

Created at April 20, 2016

परदेस में जन्मभूमि, उठती हैं मन में यादें
Updated at April 20, 2016
 

अपनी जमीन और जड़ों से जुड़े रहना अच्छी बात है। यह स्थानीयता का सम्मान है। बस इतनी सतर्कता बरतनी आवश्यक होती है कि यह मानसिकता ऐसा उग्र रूप धारण नहीं कर ले कि हम अन्य आंचलिकताओं को नकारने लग जाएं जैसा कि यदा-कदा तिनक में आकर कुछ मुम्बईया लोग किया करते रहे हैं। भू-मंडलीकरण के इस जमाने में आंचलिकताओं के अस्तित्व पर आंच आने लगी है, चाहे वैश्विक्तावादी कितना भी ढिंढोरा पीटें कि थिंक ग्लोबली एंड एक्ट लोकली। इस कथन में व्यावसायिकता स्पष्ट झलकती है और इसीलिए यह नारा आंचलिकताओं की अस्मिता एवं अस्तित्व की समस्या का सही समाधान नहीं हो सकता। स्थानीयता के प्रति मनुष्य का मोह स्वाभाविक है। तभी कहा गया है कि जननी जन्मभूमिश्च: स्वर्गादपि गरीयसी, जिन लोगों को अपनी भौगोलिकता में ही रोजी रोटी के अवसर मिल जाते हैं उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। मातृभूमि को स्वर्ग बताने वाले इस आप्त वाक्य के साथ यह दिक्कत है कि जो लोग खाने-कमाने, यानी कि व्यापार-व्यवसाय, नौकरी-पेशा एवं अन्य किस्म के रोजगार की तलाश में अपनी भौम को त्याग कर बाहर चले जाते हैं वे मातृभूमि के साथ लगाव की भावना को तो अपने मन में बसाकर रख सकते हैं परन्तु विक्रम की तरह जन्मभूमि के बेताल को कंधों पर कब तक और कैसे ढोते रह सकते हैं?
भौतिक प्रगति के इतिहास का अनुभव हमें यह बताता है कि जिंदगी में कुछ करना है तो अपनी खोल से बाहर निकलना सीख। इसका सीधा सा मतलब है कि कमाने के लिए परदेश जाना होता है। हम मारवाड़ी बनियों का उदाहरण ले सकते हैं। अगर व्यापार के लिए वे बनिया लोग लोटा व डोरी लेकर कोलकाता, चेन्नई, मुंबई नहीं पहुंचते तो धन्ना सेठ कैसे बन सकते थे? हमारे देश के सरदारों को कृषि विशेषज्ञ कहने में किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। वे हमेशा सिंचाई के पानी और कृषियोग्य भूमि के साथ-साथ आगे बढ़ते चले जाते हैं। इस कर्म के अलावा भी रोजगार के लिए भारत से बाहर जाने वाले लोगों में सर्वाधिक सरदार ही मिलेंगे।
इस पृष्ठभूमि से निकलकर मैं मेरे उस साथी के बहाने जन्मभूमि-प्रेम का वह किस्सा बताना चाह रहा हूं जो पुलिस की सेवा में मेरे बैचमेट रहे हैं। मेरे वे मारवाड़ी बैचमेट मेरे अत्यंत आत्मीय मित्र भी रहे हैं। वे जन्म से मारवाड़ी हैं, जिसका तात्पर्य है कि उनका जन्म मारवाड़ की राजधानी जोधपुर शहर के बीचों बीच हुआ। संयोग से अपनी काबिलियत अथवा जुगत के बल पर उनकी नौकरी का अधिकांश समय मारवाड़ की धरा में ही व्यतीत हुआ। संकट का दुर्योग तब आया जब एक दफा उनका पदस्थापन भरतपुर में हो गया। लाख घोड़े दौड़ाने के बाद भी वह तबादला निरस्त नहीं हुआ। आखिर उन्होंने भरतपुर के पुलिस रेंज कार्यालय में ड्यूटी ज्वाइन कर ली। उन दिनों मैं भरतपुर जिला के बयाना वृत्त में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर तैनात था। आप खूब जानते हैं कि इतिहास, परंपरा, संस्कृति, मानसिकता, बोली-भाषा, खेती-बाड़ी, नेतागिरी इत्यादि किसी भी दृष्टिकोण से भरतपुर का मेल जोधपुर से नहीं खाता। यहां तक कि भरतपुर के जाटों को शेष राजस्थान से पृथक मानकर सरकार भी उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित किए हुए है। इस माहौल में मेरे मारवाड़ी दोस्त का मन भरतपुर में कैसे लगता? भाई, यहां आकर तुम्हें कैसा लग रहा है? मेरी इस जिज्ञासा का उन्होंने जवाब दिया हरि भाई, ऐसा महसूस हो रहा है जैसे मारवाड़ की धरती पर गहरी नींद में सोये हुए मुझको बिस्तर सहित चुपके से उठाकर हेलीकोप्टर में रख दिया हो। लंबी यात्रा के पश्चात जहां टिकाया वहां नींद खुली तब स्वप्न में भी कभी नहीं देखे ऐसे पराये कस्बा में स्वयं को पाया। न इंसानी माहौल सुहाता, न यहां की  आबोहवा। दिन तो काम में गुजर जाता है मगर रातें मारवाड़ी ख्यालों से भरी रहती हैं चाहे जागता हुआ भौम का विछोह सहूं अथवा सोया हुआ सपनों में रहूं। किसी भले आदमी ने एक मंतर सिखा दिया। मारवाड़ की थोड़ी सी रेत को पोटली में बांधकर ले आया, खोलकर रोज सुबह मातृभूमि के दर्शन कर लेता हूं। इसी सहारे इस परदेश में जिंदगी कट रही है।   -हरिराम मीणा
(लेखक साहित्यकार एवं  सेवानिवृत्त आईजी  हैं।)  hrmbms@yahoo.co.in