30 March 2017, Thu

गाथा कवि सम्मेलनों की

Created at April 22, 2016

गाथा कवि सम्मेलनों की
Updated at April 22, 2016
 

यशवंत कोठारी
पिछले दिनों एक शहर के संयोजक नुमा व्यक्ति का पत्र आया,
प्रियवर!
दो वर्षों बाद पत्र दे रहा हूं। पिछले वर्ष हम कवि सम्मेलन नहीं कर सके। इस बार हमने एक कवियित्री सम्मेलन करना तय किया है। कृपया 8-10 कवयित्रियों के नाम पते भेजें। इनकी शक्ल ठीक ठाक हो। मंच पर कुछ लटके-झटके दिखा सकें। कविता रद्द हो तो भी चलेगी। गला और चेहरा बढिय़ा होना चाहिए। पारिश्रमिक की चिंता न करें। स्वस्थ्य होंगे। ‘इसे कल्पना की उड़ान न समझे।Ó
तो मेरे प्रिय पाठकों। आज के कवि सम्मेलन कितने गिर चुके हैं। देखा आपने। सोचिए, शायद कोई रास्ता बाकी हो जो, इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक ईकाई को बनाए रख सके। यह अकेला उदाहरण नहीं है। कवियों की राजनीति, राजनीतिज्ञों की कविताएं, अफसरों की मिलीभगत, मठाधीश कवियों की दादागीरी, अशलील लतीफेबाजी, सस्ती भोंड़ा हास्यास्पद रस की कविताएं और उपर से दूसरों की रचनाओं को अपने नाम से सुनाने वाले कवि और कवियित्रियां।
श्रोताओं, आयोजकों, कवियों और सांस्कृतिक कर्मियों ने कवि-सम्मेलनों को कहां से कहां तक पहुंचा दिया। आइये, जरा विस्तार से चर्चा करें।
प््राचीन काल में राज दरबारों में कवि पाए जाते थे। कालिदास विक्रमादित्य की सभा में नवरत्न थे। उस काल में अन्य कवि भी राज्याश्रय में थे। यह परम्परा मध्य युगीन राज दरबारों में भी बराबर चली आई। विद्यापति मिथिला के राजदरबार में थे। रीतिकाल में अनेक कवि राज्याश्रय पर जीवित थे।
भक्ति काल में काव्यपाठ का क्षेत्र मंदिर बने। अष्टछाप के कवियों से हिंदी साहित्य के विद्यार्थी सुपरिचित हैं। इसी काल में कविता संतों की वाणी के माध्यम से आम आदमी तक पहुंचने लगी।
धीरे धीरे सामंतशाही और राजदरबार नष्ट हुए, मंदिर सांप्रदायिकता से जकड़ गए, कीर्तनकारों ने संतों की वाणी छीन ली।
काव्य पाठ शादी ब्याह तक सीमित हो गया। वर से श्लोक सुने जाते या कविता सुनी जाती।
फिर आया उन्नीसवीं सदी का समस्या पूर्ति का दौर इस दौर में हिंदी भाषियों ने सृजन के प्रति उत्साह दिखाया, राष्ट्रभाषा के लिए आंदोलन किया गया। इसी दौरान स्थान-स्थान पर काव्य गोष्ठियां होने लगी।
भारतीयों ने इन काव्य गोष्ठियों में न केवल अंग्रेजी सरकार का विरोध शुरू किया, वरन वे राष्ट्रीय चेतना का संवाहक बन गई, लेकिन अभी तक कविता जन साधारण से दूर थी और केवल साधन संपन्न घरों तक पहुंच पाई थी।
वास्तव में विराट हिंदी कवि सम्मेलनों की कल्पना उर्दू के मुशायरों की लोकप्रियता देखकर की गई थी। मुशायरों का जन्म भी राजदरबारों में हुआ था, लेकिन राजदरबारों के हास के साथ ये जुड़ गए। मजाहिया’हास्यÓ के लिए इन मुशायरों में कोई स्थान नहीं होता था, इस कार्य हेतु हजल नामक अन्य मजलिस होती थी।
इसी दौरान ब्रजभाषा, अवधी और रामस्यापूर्ति के कवि सम्मेलनों का आयोजन शुरू हुआ। 60-70 वर्ष पूर्व से कवि सम्मेलनों का यह सिलसिला चला। जयपुर के हरि शास्त्री ने समस्या पूर्ति के क्षेत्र में बड़ा नाम कमाया। वे आशु-कवि के रूप में विख्यात हुए। इलाहबाद इस काल में राजनीतिक जागरण का ही केन्द्र नहीं था, वहां पर साहित्य से सरोकार भी था। इस काल में ’1920 से 35-40Ó समस्याओं के रूप में चरखा, खादी, शहीद, कैदी, विधवा आदि विषय दिए जाने लगे।
मुशायरे की परम्परा के अनुरूप कवि सम्मेलन का अध्यक्ष कोई बड़ा कवि या विद्वान होता था, आजकल की तरह कोई नेता या धन्ना सेठ नहीं। उस काल में लाला भगवानदीन, श्रीधर पाठक, अयोध्या सिंह उपाध्याय, जैसे कवि थे। धीरे-धीरे समय बदला। समस्यापूर्ति के कवि सम्मेलन बंद हो गए। ब्रज, अवधी और उर्दू का ह्रास हुआ।