25 February 2017, Sat

पानी पर सियासत का पानी

Created at April 28, 2016

पानी पर सियासत का पानी
Updated at April 28, 2016
 

पानी की सियासत इन दिनों परवान पर है । अब सियासत की आंखों का पानी बचा है कि नहीं ये किसी से छिपा नहीं है । सियासत इस देश में इतनी नकटी हो चुकी है कि उससे आप किसी तरह की शराफत की उम्मीद तो कम से कम मत ही कीजिए। वो घर का बिगड़ैल लड़का है जिसे आपको रोटी भी खिलानी है, लेकिन जो काम धेले भर का भी नहीं करेगा। जबकि इस देश में पानी का ये हाल है कि सेलिब्रेटीज का पूरा खानादान शुद्ध पानी बेचने में लगा है । अब ये न पूछिएगा कि ये पानी स्वयं के दायित्व बोध के समय कैसे काफूर हो जाता है। पानी न इन दिनों आंखों में बचा है, न सूखे हलक में और न ही धरा के गर्भ में। अलबत्ता पानी की रेल पर बैनर टांग फोटो खिंचाने वालों का हूजूम जरूर पूरी बेशर्मी से लगा हुआ है। बेबसी को भुनाना सियासत का पहला सबक है। जनसुविधाओं की तिजारत करने वाला माफिया जब हमारा हम निवाला, हमप्याला हो तो आचरण में इतनी सी बेशर्मी आ ही जाती है। इधर बूंद-बूंद को नागरिक तरस रहे है उधर इस्तकबाल में हजारों लीटर पानी बहाया जा रहा है । जबकि कबीर का सच सबको मालूम है कि पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जाति… लेकिन पानी का ये बुलबुला अहंकार की हवा भरते ही कुलांचे भरने लगता है। दूसरों के लिए नसीहत के तर्क, कुतर्क का वाग्जाल बुनने लगता है। तब लगता है कि पानी-पानी हो रहे हमारे भाईचारे और सौहाद्र्र पर कोई क्षेत्रीयतावाद का मायावी राक्षस अट्टाहास कर हमें मुंह चिढ़ा रहा है । सगे भाई जैसे रह रहे राज्य आपस में सिर फुटौव्वल करने लगते हैं और सियासत इठलाने लगती है । इंसानियत का पानी फिर एक बार हार जाता है। एकता, अखंडता की झीनी-झीनी चादर से संकीर्णता के बदसूरत पैरों की उंगलियां झांकने लगती हैं। पानी की पाइप बिछती जरूर हैं।  हवाई जलाशय खड़े जरूर होते हैं, लेकिन उम्मीद के नलों में पानी कभी नही आता। आती है सिर्फ  शूं-शूं की आवाज। ये आवाज ही अंतिम सत्य है । इस आवाज को सुनो  हे भद्र नागरिकों ! और अपनी आंखें नम कर लो । ये कुदरती खिदमतगार पानी, हवा, मिट्टी सब बेच रहे हैं । तिजारत का ये हुनर ही विकास की पहली सीढ़ी है।