30 March 2017, Thu

मूक जीवों पर सितम

Created at May 2, 2016

मूक जीवों पर सितम
Updated at May 2, 2016
 

अपने देश के साथ-साथ प्रदेश में भी गर्मी में राहगीरों को पेयजल उपलब्ध करवाने के साथ जानवरों और पक्षियों के लिए पीने के पानी के इंतजाम करने की परंपरा रही है। कहीं सेठ-साहूकार तो कहीं आपसी सहयोग से मनुष्यों और जानवरों के लिए प्याऊ लगवाई जाती हैं। पक्षियों के लिए परिंडे लगाए जाते हैं। दानदाताओं के साथ-साथ आमजन भी इसे पुण्य का कार्य मानते हुए अपनी भागीदारी निभाता है। वहीं हमारे वन विभाग की वन्य जीवों के प्रति संवेदनहीनता के चलते भीषण गर्मी में झालाना वन क्षेत्र में  जानवरों के लिए जलाशयों में से आधे जलाशयों में पानी भरना बंद किया जा रहा है। तर्क है कि जानवरों की गणना करने के लिए ज्यादा संसाधन नहीं लगाने पड़ेंगे। क्या मूक जानवरों के प्रति ऐसी संवेदनहीनता स्वीकार्य होनी चाहिए। जब इलाके पारा ४३ डिग्री से ऊपर चढ़ रहा हो और गर्मी से जीवों का बुरा हाल हो रहा हो ऐसे में उनके पानी को बंद करना जानवरों पर अत्याचार ही कहा जाएगा। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पानी वाले स्थानों पर जानवरों के पदचिह्नों से जानवरों की गणना करने में आसानी रहती है। इसलिए झाालाना वन क्षेत्र में १६ में से ८ पानी वाले स्थानों में ही पानी भरा जा रहा है। क्योंकि इससे जानवरों की गणना करने में कम संसाधन लगाने पड़ेंगे। सवाल यह उठता है कि क्या १६ के स्थान पर ८ जलाशय वनक्षेत्र में रह रहे ६ हजार से भी अधिक वन्यजीवों की प्यास बुझाने के लिए काफी रहेंगे। और स्थान कम करने से क्या पानी के लिए वन्य जीवों में संघर्ष की आशंका नहीं बढ़ेगी। क्या नील गाय ओर तेंदुआ एक ही स्थान पर पानी पी सकेंगे। होना तो यह चाहिए कि गर्मी में पानी के स्थान ओर पानी की मात्रा बढ़ाई जाए, जिससे वन्य जीव आराम से पानी पी सकें।