25 February 2017, Sat

पुण्यों का अक्षय फल देने वाली 'अक्षय तृतीया'

Created at May 5, 2016

पुण्यों का अक्षय फल देने वाली ‘अक्षय तृतीया’
Updated at May 5, 2016
 

जयपुर . हिन्दी वर्ष के वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया, जो कि अक्षय तृतीया के नाम से जानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु का अभिषेक कर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। अक्षय तृतीया देश के विभिन्न भागों में विविध रूप में मनाई जाती है। पुराणों में अक्षय तृतीया का एक बहुत ही अक्षय फलदायिनी तिथि के रूप में वर्णन किया गया है। इस तिथि को अक्षय तृतीया या आखातीज कहने के पीछे कई मान्यताएं एवं कथाएं प्रचलित हैं।

ज्योतिषशास्त्री सुरेश शास्त्री के अनुसार बारह मास में सभी तिथियों का क्षय होता है, लेकिन बैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस तिथि का कभी भी क्षय नहीं होता। पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर छठा अवतार लिया था तथा भगवान परशुराम भी इसी दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। दक्षिण भारत में भी इस तिथि का बड़ा महत्व है। इसी धार्मिक आस्था के चलते इस दिन बद्रीनाथ की प्रतिमा की स्थापना कर पूजा की जाती है। भगवान बद्रीनारायण मंदिर के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं। पुराणों के अनुसार युगादि तिथि होने के कारण सतयुग व त्रेता युग का प्रारंभ भी इसी दिन हुआ बताते हैं।

अक्षय पुण्य देने वाली तिथि

अक्षय तृतीया अक्षय पुण्य देने वाली तिथि मानी जाती है। इस दिन किया गया दान पुण्य फल एवं अक्षय माना जाता है। इस दिन किया गया जप, तप, हवन, ध्यान, दान, भगवत आराधना, स्वाध्याय आदि सबकुछ अक्षय हो जाता है। इस दिन किया गया दान पुण्य अक्षयकारी होने से लोग मंदिरों में जाकर जलयुक्त घड़े, छाते, पंखे, जूते, खरबूजा, ककड़ी, इमली, सत्तू आदि दान करते हैं, जिनसे अक्षय पुण्य मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस जन्म में जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाता है वह अगले जन्म में प्राप्त होती है।

सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का अनूठा संगम

अक्षय तृतीया को विवाह मुहूर्त के लिए भी जाना जाता है। इस दिन राजस्थान सहित उत्तर भारत में हजारों की संख्या में एकल एवं सामूहिक विवाह संपन्न होते हैं। इस दिन राजस्थान के अजमेर, नागौर, जोधपुर, पाली, सीकर, अलवर, जयपुर आदि जिलों में गुर्जर, रावत, जाट, रेबारी, मीणा, जाति के लोग बड़ी संख्या में बाल विवाह करते हैं।