18 December 2017, Mon

डॉ. साहब के भीतर छिपी दुर्वासा व परशुराम की आत्मा

Created at January 17, 2017

डॉ. साहब के भीतर छिपी दुर्वासा व परशुराम की आत्मा
Updated at January 17, 2017
 

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
हाल में राजस्थान की राजधानी में आयोजित हुए रुक्टा (राजस्थान यूनिवर्सिटी एंड कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन) राष्ट्रीय के अधिवेशन में प्रांत की मुख्यमंत्री ने कॉलेज शिक्षकों को भी विश्वविद्यालय शिक्षकों के समान पदनाम देने की घोषणा कर लम्बे समय से की जा रही मांग को पूरा कर दिया। विश्वविद्यालय में जहां असिस्टेंट प्रोफेसर, असोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदनाम होते हैं वहीं कॉलेज शिक्षकों के लिए मात्र एक पदनाम हुआ करता था ‘लेक्चररÓ  यानि व्याख्याता। जब मैंने अपनी नौकरी की शुरुआत की तब राज्य में कॉलेज शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय शिक्षकों से भिन्न और उनसे न्यून वेतनमान हुआ करते थे। फिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अनुशंसानुसार हमें भी उनके समान वेतनमान तो मिलने लग गए लेकिन पदनाम उनसे भिन्न बना रहा और यह बात सबको चुभती भी रही। सरकार के दरवाजे पर बार-बार गुहार लगाई जाती रही और सरकार भी सैद्धांतिक रूप से सहमत होती रही, लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ सकी। कोई चार दशकों की लंबी प्रतीक्षा के बाद मुख्यमंत्री की घोषणा से यह आस बंधी है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों के बीच का यह पदनाम गत भेदभाव अब खत्म हो जाएगा।
यह तो हुई औपचारिक और आधिकारिक बात! लेकिन इसी के साथ एक मजेदार हकीकत यह भी है कि हममें से बहुत सारे कॉलेज शिक्षक अपनी नौकरी के पहले दिन से ही स्वयं को प्रोफेसर कहते और कहलाते रहे हैं। इतना ही नहीं, राज्य और केंद्र के अब भूतपूर्व हो चुके एक मंत्री और राज्य के एक वर्तमान मंत्री को सरकारी लिखत-पढ़त में भी प्रोफेसर ही संबोधित किया जाता है, भले ही उन्होंने किसी विश्वविद्यालय में कभी नहीं पढ़ाया। एक समय था जब शिक्षक संगठन  ने भी अपने सदस्यों को सलाह दी थी कि सरकार की घोषणा का इंतजार किए बिना वे खुद को विश्वविद्यालय वाले पदनामों से विभूषित कर लें। इन तमाम बातों का जिक्र करते हुए मुझे अनायास अपनी नौकरी के पहले कुछ महीनों में मिले एक ऐसे अनूठे व्यक्तित्व की याद आ गई है जिन्हें विस्मृत कर पाना नामुमकिन है। वे संस्कृत के व्याख्याता थे और हम लोगों की तुलना में खासे वरिष्ठ थे। कोढ़ में खाज यह कि वे पी.एचडी भी थे। वे हम सबको प्रो. साहब कहकर संबोधित करते थे और अपनी वरिष्ठता के रुतबे का पूरा प्रयोग करते हुए यह अपेक्षा करते थे कि हम सब भी एक दूसरे को प्रो. साहब कहकर ही संबोधित करें।
अगर हममें से कोई किसी को नाम लेकर सम्बोधित कर देता या अपना परिचय व्याख्याता (जो हमारा वैध पदनाम था) के रूप में दे देता तो उनके कोप का भाजन बने बगैर नहीं रहता। उनके कोप की बात एक और चर्चा के बिना अधूरी रहेगी। वे पी.एचडी थे और हमेशा चाहते थे कि हम उनको न तो उनके सरनेम से सम्बोधित करें, प्रथम नाम से सम्बोधन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था, न प्रोफेसर  साहब कह कर सम्बोधित करें। उन्हें केवल और केवल ‘डॉ. साहबÓ  सम्बोधन स्वीकार्य था। कई बार असावधानीवश इससे इतर सम्बोधन कर उनके कोप भाजन बन चुके हम लोगों को धीरे-धीरे इसमें एक दुष्टतापूर्ण आनंद मिलने लगा था और आए दिन हममें से कोई न कोई उन्हें उनके सरनेम से सम्बोधित कर देता। इधर, हममें से किसी के भी मुंह से यह सम्बोधन निकलता और उधर उनके भीतर बिराजमान दुर्वासा और परशुराम की टू-इन-वन आत्मा हुंकार भर कर उठ खड़ी होती। अब यह बात तो याद नहीं कि अपने विषय में उनकी पैठ कितनी गहरी थी, लेकिन यह बात अच्छी तरह याद है कि हिंदी और अंग्रेजी इन दोनों भाषाओं में उनकी लेखन क्षमता अद्भुत थी। उनके भीतर अवस्थित दुर्वासा और परशुराम उनकी कलम की नोंक से कागजों पर उतरते और पापियों-अपराधियों को क्षत-विक्षत करने में जुट जाते। उनके सारे प्रहार लिखित रूप में होते। अपना सारा गुस्सा वे पत्रों में व्यक्त करते, जिस किसी ने भी उन्हें डॉ. साहब से भिन्न सम्बोधन से अपमानित किया होता उसके नाम वे पोस्टकार्ड लिखते और जितनी अप्रिय बातें वे लिख सकते उसमें लिख डालते।
जाहिर है कि अगले दिन वो पोस्टकार्ड कॉलेज के स्टाफ रूम में रखे डाक के डिब्बे में प्रकट होता और जिसके नाम वह प्रेषित किया गया होता उससे पहले अन्य सारे लोग उसे पढ़ चुके होते। यही तो वे डॉ. साहब चाहते भी थे, लेकिन खास बात यह कि जितनी जल्दी वे नाराज होते उतनी ही जल्दी प्रसन्न भी हो जाते। नाराज करने वाला विनम्रतापूर्वक उनसे क्षमा मांगता, उनकी विद्वत्ता की प्रशंसा करता और तीन मिनिट की वार्ता में पांच दफा उन्हें डॉ. साहब कहकर सम्बोधित करता तो वे पिघलने में भी देर नहीं करते। लेकिन क्योंकि हम लोगों के लिए तो यह एक कौतुक मात्र था, कुछ ही देर बाद हममें से कोई और उन्हें डॉ. साहब से इतर कोई और सम्बोधन देकर फिर उनके दुर्वासा-सह-परशुराम को काम पर लगा देता। पता नहीं अब वे डॉ. साहब कहां हैं!
(लेखक वरिष्ठ  साहित्यकार एवं शिक्षाविद् हैं)