18 December 2017, Mon

मेरे बदले की आग

Created at January 17, 2017

मेरे बदले की आग
Updated at January 17, 2017
 

गोविंद शर्मा
अच्छे-बुरे का पता नहीं अपने मजे के दिन तो आ गए। कछ लोगों की अवमानना होती है, उसका बदला लेने के लिए वे सारी उम्र प्रयास करते हैं, पर नहीं ले पाते। अपनी भी हुई। उसका बदला लेने के लिए अपन कुछ नहीं कर सके। पर यह जो पब्लिक है, यह सब जानती है। पब्लिक केवल वोट के दिन इधर से उधर पलट कर सिर्फ  पार्टियों का ही बदला नहीं चुकाती, अपन जैसे नामालूम के लिए भी बदला लेने के लिए धावा बोल देती है। आजकल जगह-जगह पब्लिक मेरा बदला ले रही है। कई वर्षों से जब भी मैं बैंक में जाता, अवमानना का केस बन जाता। मैं कुछ रुपए मांगता, बैंक वाले कहते नहीं मिलेंगे। क्योंकि तुम्हारे खाते में धन नहीं, ठन-ठन हैं। मैं उन्हें समझाता कि जमाना समाजवाद का है। इसमें ‘सबहि भूमि गोपालÓ की होती है। खाते-वाते को छोड़ो, यह बताओ, तुम्हारे बैंक में रुपए हैं? उनका जवाब होता-हमारे बैंक में रुपए ही रुपए हैं। यहां कभी खत्म नहीं होते। यहां तो रुपयों का पेड़ नहीं, कुआं हैं जितना निकालोगे, उतना ही फिर भर जाएगा। यह तो अच्छी बात है। अब आप खाते की दीवार तोड़कर सब को एक मान लो। तुम्हारे बैंक के धन पर सबका अधिकार मान लो। जिसको जितना चाहिए दे दो। कई बार ऐसा होता रहा। पर बैंक वाले समाजवाद विरोधी नासमझ बने रहे। एक बार मैंने कुछ ज्यादा समझाया हो एक खुर्राट बोला-बाहर जाते हो या गार्ड को बुलाऊं? मैंने भी कह दिया- पिछले साल तुम्हारा बैंक लुटेरों ने लूटा था, उस वक्त गार्ड को बुलाना भूल गए थे क्या? वह बोला- उस लूट का कोई क्लू तुम्हारे पास तो इंटरव्यू के लिए पुलिस को बुलाऊं? उसके बाद मैं बाहर आ गया। बैंक वालों से बदला लेने के लिए सपने बुनने लगा। सरकार को भी सुझाव दिया कि जो बैंक सरकारी हैं, उन्हें प्राइवेट कर दो और प्राइवेट हैं उन्हें सरकारी। पर वही हुआ जो होता है। जो मेरे जैसे साधारण पुरुष की सुने वह सरकार बना ही नहीं सकता। खैर हालात ने सुन ली। अब हर जगह बैंकों के सामने लंबी लाइनें हैं। मेरी बद्दुआओं का नतीजा है। ये लोग नोटों के लिए लाइन में नहीं लगे हैं, मेरे बदले की आग में बैंकों को झुलसाने में लगे हैं। कभी-कभी मैं भी कतार में लग कर अपने को पैसे वाला समझ लेता हूं। अब बैंक वाले यह नहीं कहते कि तुम्हारे खाते में रुपए नहीं हैं। पहले मैं बैंक से अपना सा मुंह लेकर आता था। अब बैंक वाले मेरे जैसा मुंह लेकर दुबके हुए हैं। बैंक वालो सुधर जाओ। भविष्य में मेरे जैसा कोई आए तो उसे गार्ड से निकलवाना मत।