18 December 2017, Mon

इतिहास में पहली बार सरकार में राजस्थानी का नहीं दबदबा

Created at November 12, 2014

इतिहास में पहली बार सरकार में राजस्थानी का नहीं दबदबा
Updated at November 12, 2014
 

भारत सरकार के इतिहास में पहली बार राजस्थान की उपेक्षा देखने को मिली है। भौगोलिक दृष्टि से सबसे बड़ा प्रदेश होने के बावजूद मोदी मंत्रिमंडल में किसी भी राजस्थानी सांसद को उचित स्थान नहीं मिला। तीन मंत्रियों को जरूर राज्यमंत्री बनाया गया है, लेकिन काम करेंगे तो किसी ने किसी मंत्री के हाथ के नीचे। अब तक भारत के हर प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में राजस्थान से कोई न कोई सांसद या तो कैबिनेट मंत्री रहा है या फिर किसी न किसी मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार संभाला है। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल से अब तक का यह पहला एेसा मौका है। मोदी लहर रही हो या फिर कार्यकर्ताओं की मेहनत, जनता ने भाजपा को २५ में से २५ सीटों पर विजयी बनाया है, लेकिन उनके प्रतिनिधि को उस तरह की जगह केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई, जैसी उम्मीद की जा रही थी। इतिहास में जाएं तो नेहरू सरकार के मंत्रिमंडल में कालूलाल श्रीमाली कैबिनेट मंत्री रहे। इसी तरह लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी सरकार में राज माथुर मंत्री रहे। वहीं सुरेंद्र कुमार डे भी नेहरू, शास्त्री सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में रामनिवास मिर्धा राज्यमंत्री रहे थे, उन्हें मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार मिला था। राजीव और नरसिम्हा राव सरकार में नवल किशोर शर्मा, अशोक गहलोत, बूटा सिंह, बलराम जाखड़, राजेश पायलट भी प्रभारी राज्यमंत्री रहे हैं। वीपी सिंह सरकार में भी मिर्धा कैबिनेट मंत्री थे। वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार में सीकर से सांसद चौधरी देवीलाल उपप्रधानमंत्री पद पर रहे। चंद्रशेखर सरकार में ही कल्याण सिंह कालवी और दौलतराम सारण कैबिनेट में रहे। अटल बिहारी सरकाार में जसवंत सिंह कैबिनेट और वसुंधरा राजे प्रभारी राज्यमंत्री रह चुकी हैं। वहीं मनमोहन सरकार में सीपी जोशी व नटवर सिंह कैबिनेट में रह चुके हैं। यह पहला मौका है जब राजस्थान के सांसदों को सरकार में कोई खास तवज्जो नहीं मिल सकी। अब इसका कारण कुछ भी हो पर यह देश की नीति निर्माण में राज्य की भूमिका तो सीमित करता ही है।
मोदी सरकार ने दबाव और प्रभाव को दरकिनार करते हुए मंत्रिमंडल में राजस्थान के नेताओं को लिया है। सांवर लाल जाट, राज्यवद्र्धन सिंह राठौड़ और निहाल चंद सभी को उन मंत्रालयों में लगाया गया है, जिनका चार्ज पहले से किसी न किसी कैबिनेट मंत्री के पास है। केंद्र सरकार ने तीन राज्यमंत्री मंत्री बनाकर जनता को तो खुश किया, लेकिन जो यहां की मुखिया की मर्जी थी वो शायद नहीं चल सकी। अब देखने वाली बात है कि आगे प्रदेश की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव रहता है।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तम्भकार हैं