24 September 2017, Sun

बस टाइमपास ही है यह 'हैप्पी एंडिंग'

Created at November 22, 2014

बस टाइमपास ही है यह ‘हैप्पी एंडिंग’
Updated at November 22, 2014
 

दीपक मिश्र

पांच में से ढाई स्टार

यह फिल्म आपको बहुत कुछ देने की उम्मीद बंधाती है। बीच-बीच में वह उम्मीदें जोर पकड़ती हैं, लेकिन अचानक धड़ाम से कहीं गिर जाती हैं। सीधे-सपाट शब्दों में कहूं तो फिल्म कुछ नया परोसने के बीच अपना कंफर्ट जोन ढूंढती है और इस कोशिश में कभी इधर तो कभी उधर लुढ़कती रहती है। सैफ ने इस फिल्म में करीना कपूर से लेकर प्रीति जिंटा तक को जोड़ा है, लेकिन सवाल है कि क्या इसके बावजूद वह दर्शकों को फिल्म से जोड़ पाएंगे?

ताजगी भरने की कोशिश
फिल्म अमेरिका में बेस्ड है। सैफ अली खान, गोविंदा, इलियाना डिक्रूज और कल्कि कोचलिन ने इस फिल्म में अभिनय किया है। सैफ बने हैं एक राइटर (यूडी), जो करीब पांच छह साल पहले एक किताब से फेमस होने के बाद उसकी ही रॉयल्टी पर जिंदगी बिता रहा है। गोविंदा बने हैं बॉलीवुड सुपरस्टार, जो अपने लुढ़कते करियर को संभालने के लिए एक बढिय़ा स्क्रिप्ट की तलाश में अमेरिका जा पहुंचता है। वहीं सैफ के पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ी है विशाखा (कल्कि कोचलिन)। और पहले सैफ के लिए मुसीबत फिर उसका प्यार बनकर आती है आंचल (इलियाना डिक्रूज)। वहीं सैफ का एक दोस्त भी है मोंटू (रणवीर शौरी), जो अपनी शादीशुदा जिंदगी से परेशान है।
निर्देशक राज एंड डीके ने फिल्म में ताजगी भरने की भरपूर कोशिश की है, लेकिन फिल्म की कहानी इतनी स्लो है ऊब सी होने लगती है। हालांकि वक्त वक्त पर ट्विस्ट लाकर दर्शकों को बांधने की पूरी कोशिश की जाती है। पहले हाफ में कहानी सिर्फ भूमिका बांधने में ही रह जाती है। इसके बाद जब लगता है कि सेकंड हॉफ में कहानी जोर पकड़ेगी, लेकिन सुस्ती यहां भी कायम रहती है।
अभिनेताओं का काम
अगर इस फिल्म को किरदारों के हिसाब से देखें तो यह ज्यादा मनोरंजक लगती है। मसलन रणवीर शौरी का किरदार। जब भी वह पर्दे पर आता है, तो छा जाता है। सैफ की मौजूदगी उनके आगे फीकी लगने लगती है। इसी तरह एक साइको प्रेमिका के रोल में कल्कि ने भी खूब लुभाया है। अपने बढिय़ा काम से उन्होंने साबित किया है कि अगर उन्हें कॉमेडी में मौके मिलें तो वह वहां भी अपना रंग जमा सकती हैं। हालांकि ये जवानी है दीवानी में वह इसका रंग दिखा सकती हैं। जहां तक सैफ की बात है तो उन्होंने भी अपना काम ठीक ढंग से निभाया है, लेकिन ऐसी भूमिकाओं के लिए उनकी उम्र अब ढल चुकी है। उनसे अच्छा तो उनकी छाया (योगी) रही है। गोविंदा भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहे हैं, लेकिन सिर्फ उपस्थिति। वजह ये है कि उनका किरदार फिल्म में सिर्फ फिलर मात्र के तौर पर है।

फाइनल पंच
फिल्म पूरी तरह से शहरी युवाओं को टारगेट करके बनाई गई है। भाषा और संकेतों में इसकी झलक खूब मिलती है विडंबना यह है कि न तो सैफ और न ही गोविंदा आज के युवाओं के साथ कनेक्ट कर पाते हैं। ऐसे में देखना रोचक होगा कि फिल्म कैसा प्रदर्शन करती है।