25 February 2017, Sat

आम आदमी की मुश्किलों की 'जेड प्लस'

Created at November 29, 2014

आम आदमी की मुश्किलों की ‘जेड प्लस’
Updated at November 29, 2014
 

दीपक मिश्र

पांच में से चार स्टार
इस फिल्म का हीरो एक पंचर वाला है। एक आम आदमी को जब जेड प्लस जैसी सिक्योरिटी मिल जाती है तो उसकी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है यही फिल्म मे दिखाया गया है। रामकुमार सिंह की कलम से निकली यह कहानी, दिग्गज निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में संवरी है।

नया विषय
कहानी का केंद्र है फतेहपुर में पंचर की दुकान चलाने वाला असलम (आदिल हुसैन)। अपनी पत्नी हमीदा (मोना सिंह) और एक बेटे के साथ रहता है। असलम का उसके पड़ोसी हबीब (मुकेश तिवारी) से अक्सर किसी न किसी बात को लेकर कहा-सुनी होती रहती है। इसी बीच गिरती सरकार बचाने के लिए प्रधानमंत्री खुद फतेहपुर में पीपल वाले पीर की दरगाह पर चादर चढ़ाने आते हैं। संयोग से उस दिन दरगाह पर खादिम के तौर पर असलम की ड्यूटी रहती है। यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है, जब असलम द्वारा अपनी जान को खतरा बचाए जाने पर प्रधानमंत्री उसे जेड प्लस सिक्योरिटी दे देते हैं। अब जेड प्लस को लेकर एक आम आदमी के साथ किस तरह का सियासी खेल खेला जाता है। आम-आदमी की समस्यााएं, राजनीति और उन्हें लेकर चलने वाले खेल को बखूबी बयां किया गया है।

पॉलिटिकल व्यंग्य
आज के दौर में बन रही फॉर्मूला फिल्मों और रीमेक से हटकर यह फिल्म देसीपन और आम आदमी की समस्याओं की बात करती है। रामकुमार सिंह की कहानी की तासीर काफी कड़क है। खासकर जिस तरह से राजनीतिज्ञों पर करारा व्यंग्य कसा गया है वह काफी दिलचस्प है। एक पंचर बनाने वाले असलम को लेकर केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक किस तरह मौकापरस्ती का खेल खेलती है, यह देखने लायक है। वहीं असलम की निजी समस्याओं की तरफ ये ध्यान नहीं देते।

अच्छा अभिनय
आदिल हुसैन ने अपने किरदार में मेहनत की है। मोना सिंह भी जमी हैं। वहीं मुकेश तिवारी भी रंग जमाने में कामयाब रहे हैं। वहीं साथी कलाकारों ने भी अपने अभिनय अपनी भूमिकाएं जीवंत कर दी हैं।

फाइनल पंच
फिल्म की थीम बिल्कुल अलग है। अगर आप घिसी-पिटी बालीवुडिया फिल्मों से से ऊब चुके हैं तो इस फिल्म का रुख कर सकते हैं। फिल्म में नयापन और देसीपन दोनों भरपूर है।